शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित

शिव तांडव स्तोत्र की रचना शिव के महान भगत् रावण के द्वारा की गई थी। रावण ने 1008 छंदों से शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी।

शिव तांडव स्तोत्र गीत और हिंदी में अर्थ | Shiv Tandav Stotram Lyrics and Meaning In Hindi

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥

अर्थ:- शिवजी की वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धाराएँ उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं, जिनके गले में बड़े एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी, डम-डम डमरू बजाने से ध्वनि निकल रही है, प्रचण्ड ताण्डव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें (हम सबको संपन्नता प्रदान करें)।

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥

अर्थ:- जिन शिव जी की जटाओं में अतिवेग से विलास पूर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरें उनके शीश को सुशोभित कर रहीं हैं, जिनके मस्तक पर चमकदार अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हैं, जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं, मेरा अनुराग प्रतिक्षण उनमें बढ़ता रहे।

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥

अर्थ:- जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं, शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे।

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥

अर्थ:- मैं उन शिवजी की भक्ति में आनन्दित रहूँ, जो सभी प्राणियों के रक्षक हैं, जिनकी जटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों का प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समूह रूप केसर के कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥

अर्थ:- शिव जी के चरण इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों की धूल से रंजित हैं (जिन्हें देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पण करते हैं), जिनकी जटाओं में लाल नागके हार से बंधे है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥

अर्थ:- शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें। शिवजी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभी देवों द्वारा पूज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं।

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥

अर्थ:- शिवजी ने मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर हैं, उन शिवजी में मेरी प्रीति अटल हो।(यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है)

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥

अर्थ:- जिनका कण्ठ बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो पूरे संसार का भार उठाते हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें।

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥

अर्थ:- जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभूषित है, जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, संसार के दुःखों को काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया, मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूँ।

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥

अर्थ:- जो कल्याणमय, अविनाशी, समस्त कलाओं के रस का आस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, गजासुर, अन्धकासुर के संहारक, दक्षयज्ञ विध्भंसक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥

अर्थ:- अत्यंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढ़ी हूई प्रचण्ड अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥

अर्थ:- कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टुकड़ों, शत्रु एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर समान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ।

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥

अर्थ:- कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, सिर पर अंजलि धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा?

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥

अर्थ:- देवांगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं से झड़ते हुए सुगंधमय राग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेव जी के अंगों की सुन्दरता परमानन्दयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहे।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥

अर्थ:- प्रचण्ड वडवानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्टमहासिध्दियों तथा चंचल नेत्रों वाली कन्याओं से शिव विवाह समय गान की मंगलध्वनि  सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, संसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पायें।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥

अर्थ:- इस उत्तमोत्तम शिव ताण्डव स्तोत्र को नित्य पढ़ने या श्रवण करने मात्र से प्राणी पवित्र हो, परमगुरु शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है।

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मिं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥

अर्थ:- प्रात: शिवपूजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़े आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में | The Most Easy to Read and Pronounce The Shiv Tandava Stotra 

शिव तांडव स्तोत्र:- 1

जटा ट वी गलज् जल प्रवाह पावि तस् थले
गलेऽव लम् ब्य लम् बिताम् भुजन्ग तुन्ग मालिकाम्‌।
डमड् डमड् डमड् डमन् निनाद वड् डमर वयम्
चकार चण्ड ताण्डवम् तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 2

जटा कटाह सम् भ्रम भ्रमन् नि लिम्प निर् झरी
विलोल वीचि वल् लरी विराज मान मूर् धनि।
धगद् धगद् धगज् ज्वलल् ललाट पट्ट पावके
किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रति क्षणम् मम ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 3

धरा धरेन्द्र नन् दिनी विलास बन्धु बन् धुरस्
फुरद् दिगन्त सन् तति प्रमोद मान मानसे।
कृपा कटाक्ष धो रणी निरुद् ध दुर् धरा पदि
क्व चिद् दिगम् बरे मनो विनोद मेतु वस्तुनि ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 4

जटा भुजङ्ग पिङ् गलस् फुरत् फणा मणि प्रभा-
कदम्ब कुङ्कुम द्रव प्रलिप्त दिग्व धू मुखे ।
मदान्ध सिन्धुर स्फुरत् वगुत्त रीय मेदुरे
मनो विनोद मद् भुतम् बिभर्तु भूत भर् तरि ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 5

सहस्र लोच न प्रभृ त्य शेष लेख शेखर-
प्रसून धूलि धोरणी विधू सरा ङिघ्र पीठभूः ।
भुजङ्ग राज मालया निबद् ध जाट जूटकः
श्रियै चिराय जायताम् चकोर बन्धु शेखरः ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 6

ललाट चत्वर ज्व लद् धनञ्जय स्फु लिङ्गभा-
निपीत पञ्च सायकम् नमन् निलिम्प नायकम्‌ ।
सुधा मयूख लेखया विराज मान शेखरम्
महा कपालि सम् पदे शिरो जटाल मस् तुनः ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 7

कराल भाल पट् टिका धगद् धगद् धगज् ज्वलद्
धनञ् जया हुती कृत प्रचण्ड पञ्च सायके ।
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्र पत्रक-
प्रकल्प नैक शिल् पिनि त्रिलोचने रतिर् मम ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 8

नवीन मेघ मण्डली नि रुद् ध दुर् धरस् फुरत्
कुहू निशी थिनी तमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः ।
निलिम्प निर्झरी धरस् तनोतु कृत्ति सिन्धुरः
कला निधान बन्धुरः श्रियम् जगद् धुरन् धर: ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 9

प्रफुल्ल नील पङकज प्रपञ्च कालि म प्रभा
वलम्बि कण्ठ कन्दली रुचि प्रबद्ध कन्धरम्‌।
स्मरच् छिदम् पुरच् छिदम् भवच् छिदम् मखच् छिदम्
गजच् छि दान्ध कच् छिदम् तमन्त कच् छिदम् भजे ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 10

अखर्व सर्व मङ्गला कला कदम्ब मञ्जरी
रस प्रवाह माधुरी विजृम् भणा मधु व्रतम्‌।
स्मरान् तकम् पुरान् तकम् भवान् तकम् मखान् तकम्
गजान् त कान् ध कान्तकम् तमन्त कान्तकम् भजे ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 11

जयत् वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस
द्विनिर्ग मत् क्रमस् फुरत् कराल भाल हव्य वाट्।
धिमिद् धिमिद् धिमिद् ध्वनन् मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल
ध्वनि क्रम प्रवर् तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 12

दृषद् विचित्र तल्प योर् भुजङ्ग मौक्ति कस्र जोर
गरिष्ठ रत्न लोष्ठयोः सुहृद् विपक्ष पक्ष योः।
तृणार विन्द चक्षुषोः प्रजा मही महेन्द्रयोः
सम प्रवृत्ति कः कदा सदा शिवं भजाम्यहम् ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 13

कदा निलिम्प निर्झरी निकुञ्ज कोटरे वसन्‌
विमुक्त दुर् मतिः सदा शिरःस्थ मञ्जलिम् वहन्‌।
विलोल लोल लोचनो ललाम भाल लग्नकः
शिवेति मन्त्र मुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 14

निलिम्प नाथ नागरी कदम्ब मौल मल्लिका
निगुम्फ निर्भक्षरन्म धूष्णिका मनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं महनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्ग जत्विषां चयः

शिव तांडव स्तोत्र:- 15

प्रचण्ड वाड वानल प्रभा शुभ प्रचारणी
महा अष्टसिद्धि कामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाह कालिक ध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जाय ताम्

शिव तांडव स्तोत्र:- 16

इमं हि नित्य मेव मुक्त मुत्त मोत्तम् स्तवम्
पठन् स्मरन्‌ ब्रुवन् नरो विशुद्धि मेति सन्ततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्ति माशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥

शिव तांडव स्तोत्र:- 17

पूजा ऽवसान समये दश वक्त गीतं
यः शम्भू पूजन परम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथ गजेन्द्र तुरङ्ग युक्ताम्
लक्ष्मिम् सदैव सुमुखिम् प्रददाति शम्भुः ॥

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